अम्बेडकरनगर। रामडीह सराय ग्राम पंचायत से सामने आया हैंडपंप मरम्मत घोटाले का मामला केवल एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस गहरी बीमारी का प्रतीक है, जिसने ग्राम स्वराज की अवधारणा को खोखला कर दिया है। विकास के नाम पर आवंटित सरकारी धन यदि काग़ज़ों में ही बह जाए और जनता प्यास से जूझती रहे, तो यह केवल अनियमितता नहीं बल्कि जनहित के साथ खुला विश्वासघात है।
हैंडपंप जैसी बुनियादी सुविधा, जो ग्रामीण जीवन की रीढ़ है, उसके नाम पर लाखों रुपये का गबन यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर निगरानी तंत्र किसके संरक्षण में सोया हुआ है। पंचायत रिकॉर्ड में “कार्य पूर्ण” दिखाकर भुगतान निकाल लेना और ज़मीन पर आज भी खराब पड़े हैंडपंप—यह अंतर सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब ग्रामीण सवाल उठाते हैं, तो उन्हें दबाने और डराने का प्रयास किया जाता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। अगर जवाब मांगना अपराध बन जाए, तो फिर शासन और जनता के बीच की दूरी और बढ़ेगी।
प्रशासन के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है। यदि आरोप सही हैं और फिर भी जांच में देरी या खानापूर्ति होती है, तो यह संदेश जाएगा कि भ्रष्टाचार अब जोखिम नहीं, बल्कि सुरक्षित निवेश बन चुका है। जिलाधिकारी और खण्ड विकास अधिकारी को चाहिए कि वे सिर्फ फाइलों तक सीमित न रहकर, स्थलीय सत्यापन और स्वतंत्र जांच कराएं, ताकि सच सामने आ सके।
यह मामला याद दिलाता है कि पारदर्शिता केवल नारे नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई से स्थापित होती है। दोषी चाहे प्रधान हो या सचिव—यदि उन पर कठोर दंड नहीं हुआ, तो भविष्य में ऐसे घोटाले और बढ़ेंगे।
रायडीह सराय की यह आवाज़ दरअसल हर उस गांव की आवाज़ है, जहां विकास योजनाएं काग़ज़ों में दम तोड़ देती हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस आवाज़ को सुनेगा या फिर एक और मामला फाइलों में दफन हो जाएगा।

