अंबेडकर नगर के बसखारी विकास खंड में मनरेगा दस्तावेज़ों को लेकर उठा नया विवाद जनपद की प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप—दबाव, जबरन “सूचना से संतुष्ट” लिखवाने की कोशिश, और कथित रिश्वत प्रस्ताव—सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का संकेत हैं।
आरटीआई कानून का मूल उद्देश्य है सूचना प्राप्ति को सरल, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना। लेकिन जब सूचना प्रदान करने वाला कर्मचारी ही यह कहे कि “एपीओ साहब का निर्देश है कि पैसा दे दिया जाए”, तो यह न सिर्फ कानून का मज़ाक है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के चेहरे पर सीधा तमाचा है।
अफसोस की बात यह है कि जिन दस्तावेज़ों को जनता के सामने खुला होना चाहिए, उन्हें छिपाने, दबाने या प्रभावित करने की कोशिशें अब भी जारी हैं। यह स्थिति साफ दिखाती है कि मनरेगा जैसे विशाल और संवेदनशील योजनाओं में अनियमितताओं को लेकर कितनी सतर्कता आवश्यक है।
किसी भी सूचना को “संतुष्ट” बताने का अधिकार केवल आवेदक के पास होता है, वह भी तब, जब वह पूरे दस्तावेजों की जांच-परख कर ले। इस प्रक्रिया में दबाव बनाना या रिश्वत देना न केवल भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है, बल्कि कार्यप्रणाली में गहरे बैठे भय और असुरक्षा का भी संकेत है—मानो कहीं न कहीं कुछ ऐसा है, जिसे छिपाए रखने की कोशिश हो रही है।
यह मामला सिर्फ एक विकासखंड तक सीमित नहीं है; यह पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है कि सूचना अधिकार अधिनियम को हल्के में लेने की प्रवृत्ति लोकतंत्र को कमजोर कर रही है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों द्वारा निष्पक्ष जांच की मांग पूरी तरह जायज है। संबंधित कर्मचारियों की भूमिका, दबाव बनाने की परिस्थितियाँ और कथित रिश्वत प्रस्ताव की सत्यता की जांच तेजी और पारदर्शिता से होनी चाहिए।
अगर ऐसा नहीं होता, तो यह संदेश जाएगा कि मनरेगा योजनाओं में पारदर्शिता केवल कागज़ों में है, जमीन पर नहीं।
और याद रहे—जहाँ सूचना दबती है, वहीं भ्रष्टाचार पनपता है।
समय आ गया है कि प्रशासन इस मामले को उदाहरण बनाकर ऐसी प्रवृत्तियों पर सख्त कार्रवाई करे, ताकि भविष्य में कोई भी कर्मचारी पारदर्शिता से खिलवाड़ करने का साहस न करे।

